Savitri Era of those who adore, Om Sri Aurobindo and The Mother.

Tuesday, September 11, 2007

भाषा की सरलता, बोधगम्यता व विशाल भू-भाग पर बोलने--समझने वाली भाषा की शक्ति हिन्दी के ही पास है

हिन्दी भाषा की इसी शक्ति का प्रभाव अन्य क्षेत्रों में भी दिखता है। उन्नीसवीं सदी भारत में समाज सुधार आन्दोलनों की सदी भी रही। यह काल सामाजिक पुनर्जागरण का काल था जब राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, गोपाल कृष्ण गोखले जैसे समाज सुधारकों ने कुरीतियों, अशिक्षा व अंधविश्वासों की दलदल को दलना आरम्भ किया। ये सभी हिन्दीभाषी नहीं थे किन्तु इतना जानते थे कि किसी भी राष्ट्र का चिंतन, किसी भी राष्ट्र का जीवनदर्शन या जीवन जीने की कला व उसकी अपनी विशिष्ट संस्कृति, उसकी अपनी भाषा से ही पुष्पित-पल्लवित होती है। वह जान रहे थे कि समाज सुधार की बातों व भावों को जन सामान्य के हृदय में उतारने के लिए देश की सर्वमान्य भाषा ही सक्षम है, आक्रान्ताओं की भाषा नहीं। भाषा की सरलता, बोधगम्यता व विशाल भू-भाग पर बोलने--समझने वाली भाषा की शक्ति हिन्दी के ही पास है। तब उनके नेतृत्व में अनेक संस्थाओं द्वारा हिन्दी भाषा के माध्यम से वैचारिक आन्दोलनों की नई प्राणवायु भारतीय समाज को प्राप्त हुई। अन्य अहिन्दीभाषी विद्वज्जन यथा-केशव चन्द्र, महादेव गोविन्द रानाडे, बाल गंगाधर तिलक, महर्षि अरविंद, कस्तूरी रंगायंगर, सुब्रह्मण्यम अय्यर आदि भी पीछे न रहे और इन्होंने अपने सद्प्रयासों से हिन्दी का सम्मान स्थापित किया, उसे प्रतिष्ठा दिलवाई।उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी देश के स्वतंत्रता आन्दोलन का चरमकाल थी। हिन्दी ने एक ओर जहां मिशनरियों को प्रभावित किया, सुधार आन्दोलनों की शक्ति बनी, वहीं उस शक्ति ने स्वतंत्रता आन्दोलन को उसके लक्ष्य तक पहुंचा कर स्वाधीन भारत की नींव भी रखी। इस काल में क्रांतिकारी गतिविधियां तीव्रता पकड़ रही थीं, जिनमें अनेक प्रमुख देशप्रेमी अहिन्दीभाषी क्षेत्रों के भी थे। विशेषकर विनायक दामोदर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, रास बिहारी बोस, विपिन चंद्र पाल, मानवेन्द्र नाथ राय, लाल लाजपत राय, सरदार भगत सिंह, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चन्द्र चाकी, चिदम्बरम् पिल्लै और अब्दुल गनी। हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) पर देश का हाल यह है- डा. नताशा अरोड़ा Posted by संजीव कुमार सिन्हा at 11:43 PM Labels:

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